ये वो रोशनी है, जिसे अंधेरों ने तराशा है।
#shayari
हम चल रहे हैं आँखों में दरिया लिए हुए।
साँसों की उलझनों में भी परवाज़ की है ज़िद,
पिंजरे में हैं, मगर आसमान का नक़्शा लिए हुए।
झुलसा रही है धूप मुसलसल हयात की,
तन्हा खड़े हैं हम कोई साया लिए हुए।
हारे नहीं हैं वक़्त की इन साज़िशों से हम,
ज़िंदा हैं अपनी राख में शोला लिए हुए।
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पर सफ़र में हौसला क्यों घट रहा है।
हम चले थे ख़्वाब दिल में ले के सारे,
अब नज़र से हर नज़ारा हट रहा है।
आज मन की ये थकन भी कह रही है,
अश्क बन कर हर उदासी बह रही है।
एक टुकड़ा छाँव का हम ढूँढते हैं,
धूप में ही ज़िंदगी अब रह रही है।
हम हक़ीक़त ज़िंदगी की जानते हैं,
दर्द को अपना मुक़द्दर मानते हैं।
आज ख़ुद से एक वादा कर रहे हैं,
हर ख़ुशी को दर्द में पहचानते हैं।
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झूठ था जो रास्तों ने था बताया हमको
तन्ज़ कसते हैं सितारे आज मेरी शब पर
रौशनी ने ख़ुद जला कर है बुझाया हमको
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मुकद्दर की सियाही पर, हुकूमत भी तुम्हारी है!
ग़मों को इस तरह ढँकना, लबों की मुस्कुराहट से,
तबाही पर हँसने की, ये कैसी अदाकारी है!
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गवाह खामोशियाँ हैं अब, मलामत मेरी बाक़ी है।
सुना कर फैसला अपना, क़लम खुद तोड़ दी मैंने,
क़फ़स का दर खुला है, पर हिरासत मेरी बाक़ी है।
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हासिल-ए-सुकून हो तुम
रूह तक जो उतर गया है,
वो हसीं जुनून हो तुम
मेरी तपती ज़िंदगी का...
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और मेरी तरह कोई निभा न पाएगा,
मेरे जाने के बाद हर मुस्कान तेरी,
तन्हाई में मेरा ही नाम दोहराएगा… 💫
सब कुछ मेरा छीन के आख़िर, क्यों हैरान से बनते हो?
हर चेहरे पर सौ मुखौटे, दुनिया की ये फ़ितरत है
झूठ के इस बाज़ार में तुम, क्यों इंसान से बनते हो?
बहते रहना, मिटते जाना, क़तरे की मज़बूरी है
एक ज़रा सी बूँद हो आख़िर, क्यों तूफ़ान से बनते हो?
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फिर क्यों इन बिखरे टुकड़ों में, ढूँढ रहे हो हासिल को?
अपने ही हाथों से तुमने, ख़ून किया जज़्बातों का
फिर भी इस रोते चेहरे से, ढूँढ रहे हो क़ातिल को?
पंख कतर कर ख़ुद हाथों से, कहते हो लो उड़ जाओ?
इस टूटी सी परवाज़ में क्या, ढूँढ रहे हो मंज़िल को?
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