शीशा पत्थर से टकरा कर, कहते हो लो टूट गया?
फिर क्यों इन बिखरे टुकड़ों में, ढूँढ रहे हो हासिल को?
अपने ही हाथों से तुमने, ख़ून किया जज़्बातों का
फिर भी इस रोते चेहरे से, ढूँढ रहे हो क़ातिल को?
पंख कतर कर ख़ुद हाथों से, कहते हो लो उड़ जाओ?
इस टूटी सी परवाज़ में क्या, ढूँढ रहे हो मंज़िल को?
#shayari #audioshayari
शीशा पत्थर से टकरा कर, कहते हो लो टूट गया? फिर क्यों इन बिखरे टुकड़ों में, ढूँढ रहे हो हासिल को? अपने ही हाथों से तुमने, ख़ून किया जज़्बातों का फिर भी इस रोते चेहरे से, ढूँढ रहे हो क़ातिल को? पंख कतर कर ख़ुद हाथों से, कहते हो लो उड़ जाओ? इस टूटी सी परवाज़ में क्या, ढूँढ रहे हो मंज़िल को?#shayari #audioshayari