• तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
    हज़र करो मिरे दिल से कि इस में आग दबी है

    दिला ये दर्द-ओ-अलम भी तो मुग़्तनिम है कि आख़िर
    न गिर्या-ए-सहरी है न आह-ए-नीम-शबी है

    नज़र ब-नक़्स-ए-गदायाँ कमाल-ए-बे-अदबी है
    कि ख़ार-ए-ख़ुश्क को भी दावा-ए-चमन-नसबी है

    हुआ विसाल से शौक़-ए-दिल-ए-हरीस ज़ियादा
    लब-ए-क़दह पे कफ़-ए-बादा जोश-ए-तिश्ना-लबी है

    ख़ुशा वो दिल कि सरापा तिलिस्म-ए-बे-ख़बरी हो
    जुनून ओ यास ओ अलम रिज़्क़-ए-मुद्दआ-तलबी है

    चमन में किस के ये बरहम हुइ है बज़्म-ए-तमाशा
    कि बर्ग बर्ग-ए-समन शीशा रेज़ा-ए-हलबी है

    इमाम-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन अमीर-ए-सूरत-ओ-मअनी
    'अली' वली असदुल्लाह जानशीन-ए-नबी है

    #shayari #audioshayari #mirzaghalib
    तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो हज़र करो मिरे दिल से कि इस में आग दबी है दिला ये दर्द-ओ-अलम भी तो मुग़्तनिम है कि आख़िर न गिर्या-ए-सहरी है न आह-ए-नीम-शबी है नज़र ब-नक़्स-ए-गदायाँ कमाल-ए-बे-अदबी है कि ख़ार-ए-ख़ुश्क को भी दावा-ए-चमन-नसबी है हुआ विसाल से शौक़-ए-दिल-ए-हरीस ज़ियादा लब-ए-क़दह पे कफ़-ए-बादा जोश-ए-तिश्ना-लबी है ख़ुशा वो दिल कि सरापा तिलिस्म-ए-बे-ख़बरी हो जुनून ओ यास ओ अलम रिज़्क़-ए-मुद्दआ-तलबी है चमन में किस के ये बरहम हुइ है बज़्म-ए-तमाशा कि बर्ग बर्ग-ए-समन शीशा रेज़ा-ए-हलबी है इमाम-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन अमीर-ए-सूरत-ओ-मअनी 'अली' वली असदुल्लाह जानशीन-ए-नबी है #shayari #audioshayari #mirzaghalib
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  • 'ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
    गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ

    हल्क़े हैं चश्म-हा-ए-कुशादा ब-सू-ए-दिल
    हर तार-ए-ज़ुल्फ़ को निगह-ए-सुर्मा-सा कहूँ

    मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश
    तू और एक वो न-शुनीदन कि क्या कहूँ

    ज़ालिम मिरे गुमाँ से मुझे मुन्फ़'इल न चाह
    है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे बेवफ़ा कहूँ

    आँसू कहूँ कि आह सवार-ए-हवा कहूँ
    ऐसा 'इनाँ-गुसीख़्ता आया कि क्या कहूँ

    इक़बाल-ए-कुल्फ़त-ए-दिल-ए-बे-मुद्द'आ रस्सा
    अख़्तर को दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा कहूँ

    मज़मून-ए-वस्ल हाथ न आया मगर उसे
    अब ताइर-ए-पर-बुरीदा-ए-रंग-ए-हिना कहूँ

    दुज़्दीदन-ए-दिल-ए-सितम-आमादा है मुहाल
    मिज़्गाँ कहूँ कि जौहर-ए-तेग़-ए-क़ज़ा कहूँ

    तर्ज़-आफ़रीन-ए-नुक्ता-सराई-ए-तब' है
    आईना-ए-ख़याल को तूती-नुमा कहूँ

    'ग़ालिब' है रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर से कुछ परे
    है इज्ज़-ए-बंदगी कि 'अली को ख़ुदा कहूँ

    #shayari #audioshayari #mirzaghalib
    'ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ हल्क़े हैं चश्म-हा-ए-कुशादा ब-सू-ए-दिल हर तार-ए-ज़ुल्फ़ को निगह-ए-सुर्मा-सा कहूँ मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश तू और एक वो न-शुनीदन कि क्या कहूँ ज़ालिम मिरे गुमाँ से मुझे मुन्फ़'इल न चाह है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे बेवफ़ा कहूँ आँसू कहूँ कि आह सवार-ए-हवा कहूँ ऐसा 'इनाँ-गुसीख़्ता आया कि क्या कहूँ इक़बाल-ए-कुल्फ़त-ए-दिल-ए-बे-मुद्द'आ रस्सा अख़्तर को दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा कहूँ मज़मून-ए-वस्ल हाथ न आया मगर उसे अब ताइर-ए-पर-बुरीदा-ए-रंग-ए-हिना कहूँ दुज़्दीदन-ए-दिल-ए-सितम-आमादा है मुहाल मिज़्गाँ कहूँ कि जौहर-ए-तेग़-ए-क़ज़ा कहूँ तर्ज़-आफ़रीन-ए-नुक्ता-सराई-ए-तब' है आईना-ए-ख़याल को तूती-नुमा कहूँ 'ग़ालिब' है रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर से कुछ परे है इज्ज़-ए-बंदगी कि 'अली को ख़ुदा कहूँ #shayari #audioshayari #mirzaghalib
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  • वही है मंज़र, वही है महफ़िल
    मगर अधूरे से हम यहाँ हैं
    तलाश जिसकी ज़मीन पर थी
    वो आसमाँ का कोई निशाँ है

    तलाश जिसकी ज़मीन पर थी
    वो आसमाँ का कोई निशाँ है

    #shayari #audioshayari
    वही है मंज़र, वही है महफ़िल मगर अधूरे से हम यहाँ हैं तलाश जिसकी ज़मीन पर थी वो आसमाँ का कोई निशाँ है तलाश जिसकी ज़मीन पर थी वो आसमाँ का कोई निशाँ है #shayari #audioshayari
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  • दर्द की धूप में जो जलाया मुझे,
    छाँव का फिर भरम क्यूं दिखाया मुझे?
    रूह प्यासी रही, अश्क बहते रहे,
    हम अकेले ही ये ज़ुल्म सहते रहे।

    आँसुओं को जो पलकों पे रोका गया,
    झूठ के फ़रेबों में झोंका गया।
    मैं तो साहिल पे कश्ती बचाती रही,
    मुझको लहरों के हाथों डुबोया गया।

    इश्क़ जब-जब ज़माने में माँगा गया,
    बेगुनाही को सूली पे टांगा गया।
    कातिलों को यहाँ सब ने सजदे किए,
    दिल से जिसने भी चाहा वो मारा गया।

    साँस टूटेगी जिस दिन बिखर जाएंगे,
    तेरी यादों से हम अब लिपट जाएंगे।
    दर्द की इस हद से अब गुज़र जाएंगे,
    हम अंधेरों के सीने उतर जाएंगे।

    ...हम अंधेरों के सीने उतर जाएंगे।

    #shayari #audioshayari #ishqtohlaalhai
    दर्द की धूप में जो जलाया मुझे, छाँव का फिर भरम क्यूं दिखाया मुझे? रूह प्यासी रही, अश्क बहते रहे, हम अकेले ही ये ज़ुल्म सहते रहे। आँसुओं को जो पलकों पे रोका गया, झूठ के फ़रेबों में झोंका गया। मैं तो साहिल पे कश्ती बचाती रही, मुझको लहरों के हाथों डुबोया गया। इश्क़ जब-जब ज़माने में माँगा गया, बेगुनाही को सूली पे टांगा गया। कातिलों को यहाँ सब ने सजदे किए, दिल से जिसने भी चाहा वो मारा गया। साँस टूटेगी जिस दिन बिखर जाएंगे, तेरी यादों से हम अब लिपट जाएंगे। दर्द की इस हद से अब गुज़र जाएंगे, हम अंधेरों के सीने उतर जाएंगे। ...हम अंधेरों के सीने उतर जाएंगे। #shayari #audioshayari #ishqtohlaalhai
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  • गैरों की बाहों में गिरकर...
    कैसे संभालती हो... तुम खुद को?

    मेरे जाने के बाद...
    किसके लिए संवारती हो... खुद को?

    तुझे तो... धोखेबाज़ लोगों से...सख्त नफरत थी...
    तो बताओ?
    आईने में... कैसे निहारती हो... तुम खुद को?

    #shayari #audioshayari #anjana
    गैरों की बाहों में गिरकर... कैसे संभालती हो... तुम खुद को? मेरे जाने के बाद... किसके लिए संवारती हो... खुद को? तुझे तो... धोखेबाज़ लोगों से...सख्त नफरत थी... तो बताओ? आईने में... कैसे निहारती हो... तुम खुद को? #shayari #audioshayari #anjana
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