• मेरी तपती ज़िंदगी का,हासिल-ए-सुकून हो तुम
    रूह तक जो उतर गया है,वो हसीं जुनून हो तुम

    मेरी तपती ज़िंदगी का...

    #shayari #audioshayari
    मेरी तपती ज़िंदगी का,हासिल-ए-सुकून हो तुम रूह तक जो उतर गया है,वो हसीं जुनून हो तुम मेरी तपती ज़िंदगी का... #shayari #audioshayari
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  • रोज़ सवेरे दिन का निकलना शाम में ढलना जारी है
    राख हुआ हूँ अंदर से, फिर भी जलना जारी है।

    तपती रेत पे दौड़ रहा हूँ दरिया की उम्मीद लिए
    वाक़िफ़ हूँ इस सहरा से फिर भी, ख़ुद को छलना जारी है।

    जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा
    फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

    बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था
    एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

    तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से
    वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है

    #shayari #audioshayari
    रोज़ सवेरे दिन का निकलना शाम में ढलना जारी है राख हुआ हूँ अंदर से, फिर भी जलना जारी है। तपती रेत पे दौड़ रहा हूँ दरिया की उम्मीद लिए वाक़िफ़ हूँ इस सहरा से फिर भी, ख़ुद को छलना जारी है। जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है #shayari #audioshayari
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  • चुप खड़ा हूँ... लब सिले हैं
    अश्क भी... ठहर न जाए
    काँच सा... ये दिल अकेला
    टूट कर... बिखर न जाए!

    साथ चलने की क़सम तुम, खा रहे हो आज लेकिन
    देखना ये कल तुम्हारा, दिल कहीं मुकर न जाए!

    काँच सा ये दिल अकेला, टूट कर बिखर न जाए...

    अश्क अपने जाम में मैं...आज तो मिला रहा हूँ!
    अश्क अपने जाम में मैं, आज तो मिला रहा हूँ
    पी रहा हूँ मैं इसे भी... हो कहीं ज़हर न जाए!

    चुप खड़ा हूँ... लब सिले हैं...
    अश्क भी ठहर न जाए...

    #shayari #audioshayari
    चुप खड़ा हूँ... लब सिले हैं अश्क भी... ठहर न जाए काँच सा... ये दिल अकेला टूट कर... बिखर न जाए! साथ चलने की क़सम तुम, खा रहे हो आज लेकिन देखना ये कल तुम्हारा, दिल कहीं मुकर न जाए! काँच सा ये दिल अकेला, टूट कर बिखर न जाए... अश्क अपने जाम में मैं...आज तो मिला रहा हूँ! अश्क अपने जाम में मैं, आज तो मिला रहा हूँ पी रहा हूँ मैं इसे भी... हो कहीं ज़हर न जाए! चुप खड़ा हूँ... लब सिले हैं... अश्क भी ठहर न जाए... #shayari #audioshayari
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  • अपने साए को इतना समझाने दे
    मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे

    एक नज़र में कई ज़माने देखे तो
    बूढ़ी आँखों की तस्वीर बनाने दे

    बाबा दुनिया जीत के मैं दिखला दूँगा
    अपनी नज़र से दूर तो मुझ को जाने दे

    मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ
    मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे

    फिर तो ये ऊँचा ही होता जाएगा
    बचपन के हाथों में चाँद आ जाने दे

    फ़स्लें पक जाएँ तो खेत से बिछ्ड़ेंगी
    रोती आँख को प्यार कहाँ समझाने दे

    #shayari #audioshayari
    अपने साए को इतना समझाने दे मुझ तक मेरे हिस्से की धूप आने दे एक नज़र में कई ज़माने देखे तो बूढ़ी आँखों की तस्वीर बनाने दे बाबा दुनिया जीत के मैं दिखला दूँगा अपनी नज़र से दूर तो मुझ को जाने दे मैं भी तो इस बाग़ का एक परिंदा हूँ मेरी ही आवाज़ में मुझ को गाने दे फिर तो ये ऊँचा ही होता जाएगा बचपन के हाथों में चाँद आ जाने दे फ़स्लें पक जाएँ तो खेत से बिछ्ड़ेंगी रोती आँख को प्यार कहाँ समझाने दे #shayari #audioshayari
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  • Apne Saaye Ko Itna Samjhane De - Waseem Barelvi Ki Ghazal Ka Asli Matlab Aur Naye Lyrics
    Kya aapne kabhi khud ko Waseem Barelvi ki is ghazal "Apne saaye ko itna samjhane de" me dhundha hai? Aaiye aaj iske har sher ka asan meaning samajhte hain aur padhte hain kuch naye, dil ko chhu lene wale lyrics. वसीम बरेलवी की ग़ज़ल "अपने साए को इतना समझाने दे" - दिल से दिल तक की बात हैलो दोस्तों! कैसे हैं आप सब? अक्सर ज़िंदगी की भागदौड़ में, जब हम थक कर बैठते हैं, तो कुछ लाइनें ऐसी होती...
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  • ज़िंदगी से मिले हैं जो ग़म उम्र भर
    आज उनको ग़ज़ल में सुनाने दे

    राज़-ए-दिल कब तलक हम छुपा कर रखें
    आज हर बात खुल कर बताने दे

    ख़्वाब जितने भी आँखों में सोए रहे
    आज पलकों पे उनको सजाने दे

    छोड़ आए हैं पीछे वो गलियाँ सभी
    एक नई दुनिया मुझको बसाने दे

    #shayari #audioshayari
    ज़िंदगी से मिले हैं जो ग़म उम्र भर आज उनको ग़ज़ल में सुनाने दे राज़-ए-दिल कब तलक हम छुपा कर रखें आज हर बात खुल कर बताने दे ख़्वाब जितने भी आँखों में सोए रहे आज पलकों पे उनको सजाने दे छोड़ आए हैं पीछे वो गलियाँ सभी एक नई दुनिया मुझको बसाने दे #shayari #audioshayari
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  • हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
    बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

    डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
    वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले

    निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
    बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

    भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
    अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले

    मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
    हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले

    हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी
    फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले

    हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की
    वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले

    मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
    उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

    कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
    पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

    #shayari #audioshayari #mirzaghalib
    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़ पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले #shayari #audioshayari #mirzaghalib
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  • Hazaron Khwahishen Aisi - Mirza Ghalib Ghazal Meaning, Lyrics & Explanation
    Read the deep meaning and emotional explanation of Mirza Ghalib's iconic ghazal "Hazaron Khwahishen Aisi". Understand every sher in simple, conversational Hindi and explore the magic of classic Urdu poetry with dilselyrics.com. मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी" - एक गहरी बातचीत, दिल से हैलो दोस्तों! उम्मीद है आप सब बढ़िया होंगे। आज हम एक ऐसी ग़ज़ल के बारे में बात करने वाले...
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  • कोई उम्मीद बर नहीं आती
    कोई सूरत नज़र नहीं आती

    मौत का एक दिन मुअ-'य्यन है
    नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

    आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
    अब किसी बात पर नहीं आती

    जानता हूँ सवाब-ए-ता-अत-ओ-ज़ोहद
    पर तबीअत इधर नहीं आती

    है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
    वर्ना क्या बात कर नहीं आती

    क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
    मेरी आवाज़ गर नहीं आती

    दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
    बू भी ऐ चारा-गर नहीं आती

    हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
    कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

    मरते हैं आरज़ू में मरने की
    मौत आती है पर नहीं आती

    का'बा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
    शर्म तुम को मगर नहीं आती

    #shayari #audioshayari #mirzaghalib
    कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअ-'य्यन है नींद क्यूँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी अब किसी बात पर नहीं आती जानता हूँ सवाब-ए-ता-अत-ओ-ज़ोहद पर तबीअत इधर नहीं आती है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ वर्ना क्या बात कर नहीं आती क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं मेरी आवाज़ गर नहीं आती दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता बू भी ऐ चारा-गर नहीं आती हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती मरते हैं आरज़ू में मरने की मौत आती है पर नहीं आती का'बा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' शर्म तुम को मगर नहीं आती #shayari #audioshayari #mirzaghalib
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  • Koi Umeed Bar Nahi Aati - Mirza Ghalib Ghazal, Lyrics, Meaning & Explanation
    Discover the profound sadness, insomnia, and deep meaning behind Mirza Ghalib's iconic ghazal "Koi Umeed Bar Nahi Aati". Read the line-by-line explanation in simple, conversational Hindi and explore the magic of Urdu poetry with dilselyrics.com. मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल "कोई उम्मीद बर नहीं आती" - जब दर्द की कोई दवा न मिले हैलो दोस्तों! कैसे हैं आप सब? कभी-कभी ज़िंदगी में एक ऐसा मुक़ाम आता...
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