'ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ
हल्क़े हैं चश्म-हा-ए-कुशादा ब-सू-ए-दिल
हर तार-ए-ज़ुल्फ़ को निगह-ए-सुर्मा-सा कहूँ
मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश
तू और एक वो न-शुनीदन कि क्या कहूँ
ज़ालिम मिरे गुमाँ से मुझे मुन्फ़'इल न चाह
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे बेवफ़ा कहूँ
आँसू कहूँ कि आह सवार-ए-हवा कहूँ
ऐसा 'इनाँ-गुसीख़्ता आया कि क्या कहूँ
इक़बाल-ए-कुल्फ़त-ए-दिल-ए-बे-मुद्द'आ रस्सा
अख़्तर को दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा कहूँ
मज़मून-ए-वस्ल हाथ न आया मगर उसे
अब ताइर-ए-पर-बुरीदा-ए-रंग-ए-हिना कहूँ
दुज़्दीदन-ए-दिल-ए-सितम-आमादा है मुहाल
मिज़्गाँ कहूँ कि जौहर-ए-तेग़-ए-क़ज़ा कहूँ
तर्ज़-आफ़रीन-ए-नुक्ता-सराई-ए-तब' है
आईना-ए-ख़याल को तूती-नुमा कहूँ
'ग़ालिब' है रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर से कुछ परे
है इज्ज़-ए-बंदगी कि 'अली को ख़ुदा कहूँ
#shayari #audioshayari #mirzaghalib
गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ
हल्क़े हैं चश्म-हा-ए-कुशादा ब-सू-ए-दिल
हर तार-ए-ज़ुल्फ़ को निगह-ए-सुर्मा-सा कहूँ
मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश
तू और एक वो न-शुनीदन कि क्या कहूँ
ज़ालिम मिरे गुमाँ से मुझे मुन्फ़'इल न चाह
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे बेवफ़ा कहूँ
आँसू कहूँ कि आह सवार-ए-हवा कहूँ
ऐसा 'इनाँ-गुसीख़्ता आया कि क्या कहूँ
इक़बाल-ए-कुल्फ़त-ए-दिल-ए-बे-मुद्द'आ रस्सा
अख़्तर को दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा कहूँ
मज़मून-ए-वस्ल हाथ न आया मगर उसे
अब ताइर-ए-पर-बुरीदा-ए-रंग-ए-हिना कहूँ
दुज़्दीदन-ए-दिल-ए-सितम-आमादा है मुहाल
मिज़्गाँ कहूँ कि जौहर-ए-तेग़-ए-क़ज़ा कहूँ
तर्ज़-आफ़रीन-ए-नुक्ता-सराई-ए-तब' है
आईना-ए-ख़याल को तूती-नुमा कहूँ
'ग़ालिब' है रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर से कुछ परे
है इज्ज़-ए-बंदगी कि 'अली को ख़ुदा कहूँ
#shayari #audioshayari #mirzaghalib
'ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ
हल्क़े हैं चश्म-हा-ए-कुशादा ब-सू-ए-दिल
हर तार-ए-ज़ुल्फ़ को निगह-ए-सुर्मा-सा कहूँ
मैं और सद-हज़ार नवा-ए-जिगर-ख़राश
तू और एक वो न-शुनीदन कि क्या कहूँ
ज़ालिम मिरे गुमाँ से मुझे मुन्फ़'इल न चाह
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे बेवफ़ा कहूँ
आँसू कहूँ कि आह सवार-ए-हवा कहूँ
ऐसा 'इनाँ-गुसीख़्ता आया कि क्या कहूँ
इक़बाल-ए-कुल्फ़त-ए-दिल-ए-बे-मुद्द'आ रस्सा
अख़्तर को दाग़-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमा कहूँ
मज़मून-ए-वस्ल हाथ न आया मगर उसे
अब ताइर-ए-पर-बुरीदा-ए-रंग-ए-हिना कहूँ
दुज़्दीदन-ए-दिल-ए-सितम-आमादा है मुहाल
मिज़्गाँ कहूँ कि जौहर-ए-तेग़-ए-क़ज़ा कहूँ
तर्ज़-आफ़रीन-ए-नुक्ता-सराई-ए-तब' है
आईना-ए-ख़याल को तूती-नुमा कहूँ
'ग़ालिब' है रुत्बा-फ़हम-ए-तसव्वुर से कुछ परे
है इज्ज़-ए-बंदगी कि 'अली को ख़ुदा कहूँ
#shayari #audioshayari #mirzaghalib
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