Hazaron Khwahishen Aisi - Mirza Ghalib Ghazal Meaning, Lyrics & Explanation

Read the deep meaning and emotional explanation of Mirza Ghalib's iconic ghazal "Hazaron Khwahishen Aisi". Understand every sher in simple, conversational Hindi and explore the magic of classic Urdu poetry with dilselyrics.com.


मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी" - एक गहरी बातचीत, दिल से

हैलो दोस्तों! उम्मीद है आप सब बढ़िया होंगे।

आज हम एक ऐसी ग़ज़ल के बारे में बात करने वाले हैं जिसे शायरी की दुनिया का 'ताज' कहा जा सकता है। आप चाहे शायरी पढ़ते हों या नहीं, आपने अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी, किसी न किसी के मुँह से ये लाइन तो ज़रूर सुनी होगी— "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले।"

मिर्ज़ा असद-उल्लाह खाँ 'ग़ालिब' (Mirza Ghalib) की क़लम से निकली ये ग़ज़ल इंसान के दिल, उसकी उम्मीदों, मोहब्बत और ज़िंदगी की हक़ीक़त का एक ऐसा आईना है, जो आज इतने सालों बाद भी बिल्कुल नया लगता है। तो चलिए, आज इस मास्टरपीस को सिर्फ़ पढ़ते नहीं हैं, बल्कि इसके हर शेर के पीछे छिपे ग़ालिब के दर्द और उनकी गहरी सोच को महसूस करते हैं।

ओरिजिनल ग़ज़ल (Original Lyrics)

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले

मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले

हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले

हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले


हर शेर का अर्थ और उसका एहसास (Meaning & Feeling)

ग़ालिब को समझना एक सफ़र की तरह है। आइए, इस सफ़र पर चलते हैं और हर शेर को अपनी आम बोलचाल की भाषा में डिकोड करते हैं:

1. इंसानी लालच और ख्वाहिशों का भँवर

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

क्या फील होता है: हम इंसानों का दिल कभी भरता है क्या? नहीं ना। ग़ालिब कह रहे हैं कि मेरे दिल में इतनी सारी ख्वाहिशें हैं कि हर एक ख्वाहिश इतनी इंटेंस है कि उस पर जान देने का दिल करता है। मेरी ज़िंदगी में मेरी बहुत सी इच्छाएं पूरी भी हुईं, लेकिन जब मैं मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि यार, अभी भी बहुत कम ही पूरी हुई हैं। ये शेर हमारी कभी न ख़त्म होने वाली 'wants' (इच्छाओं) की परफेक्ट तस्वीर है।

2. आँसुओं का बहना और क़ातिल का डर

डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले

क्या फील होता है: यहाँ ग़ालिब मोहब्बत में मिले दर्द की बात कर रहे हैं। वो कहते हैं कि मेरा क़ातिल (महबूब) मुझे मारने से क्यों डर रहा है? उसे लगता है कि मेरे खून का इल्ज़ाम उसके सिर आएगा? अरे, वो खून तो मेरी भीगी हुई आँखों (चश्म-ए-तर) से ज़िंदगी भर आँसू बनकर वैसे ही लगातार बह चुका है। अब तो मेरे अंदर खून बचा ही नहीं है!

3. स्वर्ग से निकाले जाने से भी बड़ी बेइज़्ज़ती

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

क्या फील होता है: ये इस ग़ज़ल का सबसे ज़्यादा कोट (quote) किया जाने वाला शेर है। 'ख़ुल्द' मतलब जन्नत (स्वर्ग) और 'आदम' मतलब पहले इंसान (Adam)। हमने बचपन से कहानियाँ सुनी हैं कि आदम को कितनी बेइज़्ज़ती के साथ जन्नत से निकाला गया था। ग़ालिब अपने महबूब से कहते हैं कि आदम का जन्नत से निकाला जाना तो कुछ भी नहीं था, जब मुझे तुम्हारी गली (कूचे) से धक्के मार कर निकाला गया, तो मेरी बेइज़्ज़ती उससे कहीं ज़्यादा हुई थी।

4. हुस्न का गुरूर

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले

क्या फील होता है: ये थोड़ा टिपिकल उर्दू शेर है। इसमें महबूब के लंबे कद (क़ामत की दराज़ी) और उसके घुंघराले बालों (तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म) की बात हो रही है। ग़ालिब मज़ाक में कहते हैं कि ऐ ज़ालिम, तेरा कद इसलिए लंबा नहीं है कि तू असल में लंबा है, बल्कि तेरे बालों में जो इतने सारे घुंघराले पेच हैं, अगर वो सीधे कर दिए जाएं, तो तेरे लंबे होने का सारा गुरूर (भरम) टूट जाएगा। ये महबूब से एक प्यारी सी छेड़छाड़ है।

5. ख़त लिखने का बहाना

मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले

क्या फील होता है: यहाँ ग़ालिब की दीवानगी दिखती है। वो कहते हैं कि अगर गली में किसी को भी मेरे महबूब को खत लिखवाना हो, तो वो सिर्फ़ मुझसे लिखवाए। इसी बहाने मैं अपने महबूब से बात कर पाऊँगा या उसके बारे में सुन पाऊँगा। इस इंतज़ार में वो सुबह-सुबह कान पर पेन (क़लम) अटका कर घर से निकल पड़ते हैं कि शायद कोई उन्हें ख़त लिखने के लिए बुला ले।

6. शराब और रुसवाई

हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले

क्या फील होता है: 'बादा-आशामी' का मतलब है शराब पीना, और 'जाम-ए-जम' एक जादुई प्याला था (राजा जमशेद का) जिसमें पूरी दुनिया का हाल दिखता था। ग़ालिब कहते हैं कि मेरे ज़माने में लोग मुझे शराबी कहकर बदनाम करते थे, लेकिन मेरे बाद ऐसा वक़्त आया जब दुनिया ने शराब के नशे को एक अलग ही रुतबा दे दिया।

7. हमदर्द ही जब दर्द में हो

हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले

क्या फील होता है: कभी ऐसा हुआ है कि आप अपना दुखड़ा रोने किसी के पास गए हों, और पता चले कि उसकी ज़िंदगी तो आपसे भी ज़्यादा झंड है? ग़ालिब यही कह रहे हैं। जिनसे मुझे उम्मीद (तवक़्क़ो) थी कि वो मेरे ज़ख्मों (ख़स्तगी) पर मरहम लगाएंगे, वो तो मोहब्बत की तलवार से मुझसे भी ज़्यादा बुरी तरह घायल निकले!

8. मोहब्बत में जीना और मरना

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

क्या फील होता है: बहुत ही गहरा और रोमांटिक शेर है। प्यार में जीने और मरने के बीच की लाइन मिट जाती है। ग़ालिब कहते हैं कि हम उसी इंसान (काफ़िर/महबूब) का चेहरा देखकर ज़िंदा रहते हैं, जो हमारी जान निकाल लेता है। मतलब, जो हमारी मौत का कारण है, वही हमारे जीने की वजह भी है।

9. ढोंगी समाज पर तंज़

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

क्या फील होता है: 'वाइज़' का मतलब होता है उपदेशक या प्रवचन देने वाला (जो अक्सर शराब पीने को पाप बताता है)। ग़ालिब यहाँ समाज के ढोंग पर हँसते हुए कहते हैं कि भला एक उपदेशक का शराबख़ाने (मय-ख़ाने) से क्या काम? लेकिन मैंने खुद देखा है, कल जैसे ही मैं शराबख़ाने से बाहर निकल रहा था, वो चुपके से अंदर घुस रहा था!


कुछ आख़िरी बातें...

ग़ालिब सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, वो इंसान की साइकोलॉजी (Psychology) के बहुत बड़े जानकार थे। "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी" हमें बताती है कि ज़िंदगी में सब कुछ नहीं मिलता, और यही ज़िंदगी की असली खूबसूरती भी है।

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कमेंट करके बताइएगा कि इस ग़ज़ल का कौन सा शेर आपके दिल के सबसे करीब है!

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