चेहरे पे मुकम्मल रज़ा की रौनक सजाए बैठे हैं,
उसे महफूज़ रखने को, खुद पे तोहमत लगाए बैठे हैं।
जो बिखर कर टूट गए हैं हम, तो ताज्जुब कैसा,
कोई बाज़ी नहीं, हम अपनी ज़िंदगी गँवाए बैठे हैं।
#shayari #audioshayari
उसे महफूज़ रखने को, खुद पे तोहमत लगाए बैठे हैं।
जो बिखर कर टूट गए हैं हम, तो ताज्जुब कैसा,
कोई बाज़ी नहीं, हम अपनी ज़िंदगी गँवाए बैठे हैं।
#shayari #audioshayari
चेहरे पे मुकम्मल रज़ा की रौनक सजाए बैठे हैं,
उसे महफूज़ रखने को, खुद पे तोहमत लगाए बैठे हैं।
जो बिखर कर टूट गए हैं हम, तो ताज्जुब कैसा,
कोई बाज़ी नहीं, हम अपनी ज़िंदगी गँवाए बैठे हैं।
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