ख़ुदारा इक निगाह-ए-नाज़ ही से देख लो हम को,
गरेबाँ, फाड़ने को आज, हम तय्यार बैठे हैं
कहाँ अब होश बाकी है, हमें इस आब-ओ-दाने का,
तुम्हारी इक झलक के हम, तलबगार बैठे हैं।
फ़क़त इक बार कह दो तुम, कि 'हम भी हैं, तुम्हारे ही',
न जाने कब से इस उम्मीद पे, बेक़रार बैठे हैं।
चले आओ कि, अब तो साँस भी रुक-रुक के आती है,
लबों पे जान लेकर हम तेरे बीमार बैठे हैं।
गरेबाँ, फाड़ने को आज, हम तय्यार बैठे हैं
#shayari #audioshayari
गरेबाँ, फाड़ने को आज, हम तय्यार बैठे हैं
कहाँ अब होश बाकी है, हमें इस आब-ओ-दाने का,
तुम्हारी इक झलक के हम, तलबगार बैठे हैं।
फ़क़त इक बार कह दो तुम, कि 'हम भी हैं, तुम्हारे ही',
न जाने कब से इस उम्मीद पे, बेक़रार बैठे हैं।
चले आओ कि, अब तो साँस भी रुक-रुक के आती है,
लबों पे जान लेकर हम तेरे बीमार बैठे हैं।
गरेबाँ, फाड़ने को आज, हम तय्यार बैठे हैं
#shayari #audioshayari
ख़ुदारा इक निगाह-ए-नाज़ ही से देख लो हम को,
गरेबाँ, फाड़ने को आज, हम तय्यार बैठे हैं
कहाँ अब होश बाकी है, हमें इस आब-ओ-दाने का,
तुम्हारी इक झलक के हम, तलबगार बैठे हैं।
फ़क़त इक बार कह दो तुम, कि 'हम भी हैं, तुम्हारे ही',
न जाने कब से इस उम्मीद पे, बेक़रार बैठे हैं।
चले आओ कि, अब तो साँस भी रुक-रुक के आती है,
लबों पे जान लेकर हम तेरे बीमार बैठे हैं।
गरेबाँ, फाड़ने को आज, हम तय्यार बैठे हैं
#shayari #audioshayari