रोज़ सवेरे दिन का निकलना शाम में ढलना जारी है
राख हुआ हूँ अंदर से, फिर भी जलना जारी है।

तपती रेत पे दौड़ रहा हूँ दरिया की उम्मीद लिए
वाक़िफ़ हूँ इस सहरा से फिर भी, ख़ुद को छलना जारी है।

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा
फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था
एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है

#shayari #audioshayari
रोज़ सवेरे दिन का निकलना शाम में ढलना जारी है राख हुआ हूँ अंदर से, फिर भी जलना जारी है। तपती रेत पे दौड़ रहा हूँ दरिया की उम्मीद लिए वाक़िफ़ हूँ इस सहरा से फिर भी, ख़ुद को छलना जारी है। जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है #shayari #audioshayari
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