जो मुट्ठी से फिसल जाए वो रेत है शायद
तो फिर इस रेत पर यादों का पहरा क्यों है

बदल जाते हैं चेहरे वक़्त की ज़द में आकर
मगर यादों का मंज़र अब भी ठहरा क्यों है

#shayari
जो मुट्ठी से फिसल जाए वो रेत है शायद तो फिर इस रेत पर यादों का पहरा क्यों है बदल जाते हैं चेहरे वक़्त की ज़द में आकर मगर यादों का मंज़र अब भी ठहरा क्यों है #shayari
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