कंधों पे गर्दिशों का कोई सेहरा लिए हुए,
हम चल रहे हैं आँखों में दरिया लिए हुए।
साँसों की उलझनों में भी परवाज़ की है ज़िद,
पिंजरे में हैं, मगर आसमान का नक़्शा लिए हुए।
झुलसा रही है धूप मुसलसल हयात की,
तन्हा खड़े हैं हम कोई साया लिए हुए।
हारे नहीं हैं वक़्त की इन साज़िशों से हम,
ज़िंदा हैं अपनी राख में शोला लिए हुए।
#shayari
हम चल रहे हैं आँखों में दरिया लिए हुए।
साँसों की उलझनों में भी परवाज़ की है ज़िद,
पिंजरे में हैं, मगर आसमान का नक़्शा लिए हुए।
झुलसा रही है धूप मुसलसल हयात की,
तन्हा खड़े हैं हम कोई साया लिए हुए।
हारे नहीं हैं वक़्त की इन साज़िशों से हम,
ज़िंदा हैं अपनी राख में शोला लिए हुए।
#shayari
कंधों पे गर्दिशों का कोई सेहरा लिए हुए,
हम चल रहे हैं आँखों में दरिया लिए हुए।
साँसों की उलझनों में भी परवाज़ की है ज़िद,
पिंजरे में हैं, मगर आसमान का नक़्शा लिए हुए।
झुलसा रही है धूप मुसलसल हयात की,
तन्हा खड़े हैं हम कोई साया लिए हुए।
हारे नहीं हैं वक़्त की इन साज़िशों से हम,
ज़िंदा हैं अपनी राख में शोला लिए हुए।
#shayari