लफ़्ज़ होठों पे रुके, आँख में नमी रह गई
पास वो होकर भी, जाने क्या कमी रह गई
हम चले थे मुकद्दर को सँवारने ऐ दोस्त
वक़्त की गर्द इन हाथों पे ही जमी रह गई
#shayari
पास वो होकर भी, जाने क्या कमी रह गई
हम चले थे मुकद्दर को सँवारने ऐ दोस्त
वक़्त की गर्द इन हाथों पे ही जमी रह गई
#shayari
लफ़्ज़ होठों पे रुके, आँख में नमी रह गई
पास वो होकर भी, जाने क्या कमी रह गई
हम चले थे मुकद्दर को सँवारने ऐ दोस्त
वक़्त की गर्द इन हाथों पे ही जमी रह गई
#shayari
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