अपने हाथों ज़हर पिला कर, क्यों अनजान से बनते हो?

सब कुछ मेरा छीन के आख़िर, क्यों हैरान से बनते हो?


हर चेहरे पर सौ मुखौटे, दुनिया की ये फ़ितरत है

झूठ के इस बाज़ार में तुम, क्यों इंसान से बनते हो?


बहते रहना, मिटते जाना, क़तरे की मज़बूरी है

एक ज़रा सी बूँद हो आख़िर, क्यों तूफ़ान से बनते हो?


#shayari #audioshayari

अपने हाथों ज़हर पिला कर, क्यों अनजान से बनते हो?सब कुछ मेरा छीन के आख़िर, क्यों हैरान से बनते हो?हर चेहरे पर सौ मुखौटे, दुनिया की ये फ़ितरत हैझूठ के इस बाज़ार में तुम, क्यों इंसान से बनते हो?बहते रहना, मिटते जाना, क़तरे की मज़बूरी हैएक ज़रा सी बूँद हो आख़िर, क्यों तूफ़ान से बनते हो?#shayari #audioshayari
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